Der Winter Schönheit

Es war die Winterseit. Ich sah durch das Fenster. Oh ! dachte ich , es ist sehr Kalt . Man kann nicht die Sonne sehen , Man kann nicht weiter sehen auch. Keine Farben alle war Grau und es war nur Nebel. Weil ich die Sonne sehen wollte ,hatte ich in der Balkon gegangen. Aber ich hatte die Sonne nicht gefunden,weil es bewolkt war . Ich bin traurig  gewesen. Plötzlich sah ich eine dunkle rosa Blume in meiner Balkon. Die Blume war sehr freich , weich , schöne und prima.Ich hatte die Sonne nicht gefunden aber ich hatte gefunden dass alle Jahrzeiten mehere Farben haben ,Und alle Farben sind sehr schön.

 

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अह ! फ्रैक्चर

बीते कुछ दिनों पहले ऐसा लगा की जैसे मेरी जिंदगी में अचानक से पूर्णविराम लग गया हो ,सब कुछ रुक गया हो l एसा क्यों हुआ ? मै कुर्सी से गिर गयी थी , और सिर्फ इसी कारण से मुझे हाथ मै फ्रैक्चर हो गया था l जब गिरी तो सबसे पहले मम्मी दादी  और मै खूब हंसे पर फिर जब हाथ सीधा करने की कोशिश की तो , असहनीय दर्द हुआ l थोड़ी देर बाद सुजन भी आ गयी , भाई अब तो डॉक्टर के पास जाना ज़रूरी था l और फिर क्या  जब वापस घर आये तो मेरे साथ- साथ हाथ मै प्लास्टर भी था l और मेरा ये प्लास्टर मेरे सीधे हाथ में था l

बचपन में मुझे प्लास्टर बंधे लोगो को देख कर हमेशा यही लगता था कि ये लोग काम कैसे करते होंगे जैसे  लिखना,खाना, नहाना, कपड़े बदलना , और भी बहुत कुछ l इन सारे प्रश्नों के जवाब मुझे एक बार में मिल गये वो भी अच्छे खासे अनुभव के साथ l मेरे सीधे हाथ मै फ्रैक्चर की वजह से मै लिख नहीं पा रही थी, गाने सुनते हुए बीच बीच मै जो डांस करने की आदत थी ,वो कर तो रही थी पर एक हाथ पर जब प्लास्टर हो तो ये थोड़ा अजीब और हास्यास्पद होता है l चोटी बंधवाने के लिये भी मम्मी के पास जाना पड़ रहा था l प्लास्टर वाले हाथ के साथ सोना भी अजीब था करवट भी ना ले पाओ  और दर्द और होता था, सूखने पर प्लास्टर कभी भारी भी हो चुका था l सबसे ज्यादा बुरा तो तब लगा जब पासपोर्ट के लिये  वेरिफिकेशन करने पुलिस मेरे घर प्लास्टर लगने के अगले दिन आ गयी l अह ! किसी तरह हाथ को टेढ़ा मेढ़ा कर टेढ़े – मेढ़े से हस्ताक्षर कर दिए l पेंटिंग नहीं कर पाई , हलाकि उलटे हाथ से कोशिश की थी पर फिर भी l फिर सोचा चलो आज मौसम अच्छा है तो एकाध फोटो ले लेती  हूं l  ये काम हो गया, उलटे हाथ से l हाँ पर बहुत कुछ अच्छा भी हुआ, जैसे मेरे कई शुभचिंतक फ्रेंड्स और आस पड़ोस के  लोग मिलने आये , बड़ा अच्छा लगा l फ़ोन पर भी हालचाल पूछे गये lअंततः ये हालत हो गयी थी की मै सबको फ्रैक्चर की कहनी सुना सुना के बोर हो गयी एसा लगा की अपने गले में एक बोर्ड लटका लू जिस पर लिखा हो – “की फ्रैक्चर कुर्सी से गिरने से हुआ, और मै गाड़ी से नहीं गिरी  घर पर ही गिरी हूं” , क्योंकि सब अगला प्रश्न यही करते थे की घर पर ही गिर गयी ? आखिरी  दिन आते आते मेरे प्लास्टर मै मेसेजेस लिखे जा चुके थे l जो पानी लगने से फैल चुके थे , मेरा प्लास्टर हरा और कला सा हो गया था इंक से l हाँ फुलकी खाई थी , उलटे हाथ से तो पानी भी गिर गया था  ,इसके अलावा दाल -चावल का दाग भी उस पर था l अब मेरा प्लास्टर अच्छा नहीं दिख रहा था l  और टाइम भी आ गया था प्लास्टर हटवाने का l मै बहुत खुश  थी उस दिन l आख़िरकार प्लास्टर कटा l हाथ को चलने के लिये कई दिनों तक  एक्सरसाईस चली, सिकाई हुई और आज हाथ सीधा है , और आज गाड़ी भी चलाई l बड़ा मज़ा आया l प्लास्टर चढ़ने पर कुछ अच्छी बातें जो मुझे पता चली –

पहले तो ये की हलाकि प्लास्टर लिखने के बाद मै उल्टे हाथ से लिखना तो नहीं सीख पाई , पर हाँ  प्लास्टर होने पर भी मैनेज किया जा सकता है l

ये भी पता चला की कोई गतिमान को बहुत दिनों तक एक ही स्तिथी मै पड़े रहने दिया जाए तो वो जाम हो जाती है इसलिए आगे बढ़ते रहो l

कोई भी भर ले कर सोना अजीब होता है मानसिक भर को इस  परिपेक्ष्य मै ज़रूर लाइए l

एक महतवपूर्ण बात ये पता चली की प्लास्टर लगने से जिंदगी नहीं रूकती इसलिए मै इस बीच काफी  घूमी भी l

और हाँ कल ही जब वापस कुर्सी पर  खड़ी हुई तो पापा की आवाज़ आई , देखो फिर मत गिर जाना , और मै सम्हल गई l

बस इतना काफी था l

 

रंग

आज बड़े दिनों बाद जब,

मैंने मन के सेलाबो को केनवास पर

उतारने के लिए रंगों को समेटा,

तो उन रंगों को फीका सा पाया,

वे रंग असली नहीं थे l

मुझे रंग चाहिए जिनमे,

घास के तिनके पर दिखने वाली हरे रंग सी चटख हो,

अपनी माँ को देख बच्चे की आँखों मे आने वाली चमक हो,

रंग जिनमे नीले आसंमा सी व्यापकता, और,

हरे- नीले समुद्र की लहरों सी चंचलता हो,

वह रंग भी चाहिए,

जिसमे सूरज अपने नारंगी – पीली किरणों को और अधिक फैला दे,

और वो लाल रंग जो गोकुल गाय के मखमली आवरण सा आभास दे,

एक पारदर्शी रंग जिसमे पानी सी तरावट हो, वह भी चाहिये

और वह रंग भी चाहिए,

जो रात को चाँद सा उजला और दिन को और अधिक गहरा बना देता है,
फिर भी एक रंग की कमी है,

शायद यह वह रंग होगा, जो इन सब रंगों से मिलकर बनेगा,

और फिर सजीव हो उठेगी केनवास पर मेरी छोटी सी दुनिया,

मुझे अब रंग भरने के लिए नए रंग चाहिए,
और हर रंग असली  चाहिए  l

खादी

मैं  बहुत  खुश थी ,जब मुझे पता चला कि मेरी यूनिवर्सिटी मे  खादी  पहनना  होता है l पापा की पुरानी फोटोज़  मे पापा हमेशा खादी पहने होते थे l साथ मे  झोला भी बाज़ू  मे टंगा होता था l इसी  कल्पना  के साथ मैंने खादी  के ढेरो सूट सिलवाए l मुझे ख़ुशी थी और गर्व भी l Image

मेरी यूनिवर्सिटी गाँधी जी के विचारो पर आधारित है l सन  1935  मै जब यह स्थपित हुई,उस समय भारत की आज़ादी के लिए संघर्ष चल रहा था ,किसी ने हिंसा का रास्ता अपनाया तो किसी ने अहिंसा का l  अंहिंसा मे  सविनय अवज्ञा आन्दोलन ,सत्याग्रह और स्वदेशी अपनाओ अदि शामिल  थे l और  खादी स्वदेशी अपनाओ की ही देन थी l  इसी सम्मान की आस मै खादी हमारे यूनिवर्सिटी  की  ड्रेस कोड थी l जो वंहा के मौसम के भी अनुकूल थी l पर यूनिवर्सिटी मै महोल अलग था l छात्राओं के लिए खादी पहनना एक बोझ की तरह था l प्रशासन चाहता था की छात्राए  खादी  पहने  ,पर छात्राए इससे सहमत नहीं थी l मै  खादी  पहनती थी क्योंकि मै इसमें सहज  महसूस करती थी l
खेर, खादी  को सम्मान देने के लिए इसे ड्रेस कोड बनाना , यूनिवर्सिटी का अपना मत था l
पर खादी शर्मिन्दा हुई ,जब उसने पाया कि  वह जबरन पहनाई  जा रही है , खादी  और भी  शर्मिन्दा हुई जब उसे न पहनने पर जुर्माना लगाया गया, खादी तब  और अधिक  शर्मिन्दा हुई जब जुर्माने से बचने के लिए छात्राओ ने खादी  की  तरह दिखने वाले कपड़ो  को  पहनना शुरू किया l
क्या इसी आदर की हक़दार है खादी ???
Khadi  is a Thread Of Freedom.  खादी अपनाने का मूल उद्दॆश्य  स्वावलंबन से था ,ताकि हम अपने लघु उद्योगों  को बढ़ावा दे सके ,और आर्थिक रूप से स्वतंत्र हो सके l खादी मात्र एक धागा नहीं है यह वह धागा है जो हमें स्वावलंबी बनाने मै सार्थक रही है l
तो क्यों न खादी का  सम्मान कुछ इस तरह से  करे कि इसे  लोगो द्वारा  स्वतंत्रता से अपनाने दिया जाए , न कि  नियम  बना कर l